उपराष्ट्रपति बेलगावी के यदुर स्थित श्री वीरभद्रेश्वर मंदिर में राजगोपुरम, कलशारोहण और महाकुंभाभिषेकम समारोह के उद्घाटन में मुख्य अतिथि के रूप में शामिल हुए

हिंदू चेतना केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है, बल्कि यह जीवन जीने की एक पद्धति है: उपराष्ट्रपति
उपराष्ट्रपति ने आध्यात्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान में वीर-शैव लिंगायत परंपरा के महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया
भारत की आध्यात्मिक दृष्टि प्रकृति और प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता के दर्शन करती है: उपराष्ट्रपति
सनातन धर्म की समय द्वारा परीक्षा ली जा सकती है, लेकिन इसे कभी मिटाया नहीं जा सकता: उपराष्ट्रपति
प्रधानमंत्री का “विकास भी, विरासत भी” का विजन केवल एक कथन नहीं, बल्कि यह संकल्प है कि भारत का विकास और विरासत साथ-साथ चलें: उपराष्ट्रपति
पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार केवल वास्तुकला का विषय नहीं, बल्कि यह सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरूकता को पुनर्स्थापित करना है: उपराष्ट्रपति

उपराष्ट्रपति, श्री सी. पी. राधाकृष्णन आज कर्नाटक के बेलगावी जिले के यदुर स्थित श्री वीरभद्रेश्वर मंदिर में राजगोपुरम, कलशारोहण और महाकुंभाभिषेकम समारोह के उद्घाटन में मुख्य अतिथि के रूप में सम्मिलित हुए।

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श्री क्षेत्र यदुरू में सभा को संबोधित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने इस अवसर को आध्यात्मिक पुनर्जागरण और सभ्यतागत गौरव के पुनर्मूल्यांकन का क्षण बताया।

उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत केवल एक राष्ट्र नहीं, बल्कि एक जीवंत सभ्यता है—सिंधु घाटी से लेकर कन्याकुमारी तक प्रवाहित होने वाली चेतना की एक अखंड धारा। उन्होंने रेखांकित किया कि यह वह पवित्र भूमि है जहाँ वेदों के शाश्वत ज्ञान को पहली बार सुना गया था और जहाँ श्रीमद्भगवद्गीता का गहन संदेश आज भी मानवता को साहस के साथ कर्म करने, धर्मपरायणता के साथ जीने और पूर्ण श्रद्धा के साथ समर्पण करने का मार्ग दिखा रहा है।

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यह रेखांकित करते हुए कि हिंदू चेतना केवल रीति-रिवाजों तक सीमित नहीं है बल्कि यह जीवन जीने की एक पद्धति है, उपराष्ट्रपति ने “वसुधैव कुटुम्बकम” यानि संपूर्ण विश्व एक परिवार है के कालातीत दर्शन और भारत की उस आध्यात्मिक दृष्टि पर बल दिया जो प्रकृति और प्रत्येक मनुष्य में दिव्यता के दर्शन करती है।

वीर-शैव लिंगायत परंपरा का उल्लेख करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कर्नाटक और पड़ोसी राज्य महाराष्ट्र के आध्यात्मिक, शैक्षिक, सांस्कृतिक और सामाजिक उत्थान में इसके महत्वपूर्ण योगदान को रेखांकित किया। उन्होंने कहा कि वीर-शैव मठों और मंदिरों ने श्रद्धा, सेवा और सामाजिक समरसता के मूल्यों को पोषित करने में एक परिवर्तनकारी भूमिका निभाई है।

उपराष्ट्रपति ने शिव योगी श्री कदासिद्धेश्वर स्वामीजी की आध्यात्मिक दृष्टि के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करते हुए कहा कि उन्होंने समय के साथ ओझल हो चुके इस पवित्र स्थल को पुनः खोजा और उसका पुनरुद्धार किया, जिससे सनातन धर्म की शाश्वत ज्योति एक बार फिर प्रज्वलित हुई। उन्होंने अटूट विश्वास के साथ कहा कि सनातन धर्म की समय द्वारा परीक्षा ली जा सकती है, लेकिन इसे कभी मिटाया नहीं जा सकता।

उन्होंने दैनिक पूजा-अर्चना, अनुष्ठान, जीर्णोद्धार कार्यों और आध्यात्मिक सेवा को अक्षुण्ण बनाए रखने में श्री कदासिद्धेश्वर मठ के उत्तराधिकारी पीठाधीश्वरों के अथक प्रयासों की सराहना की।

प्रधानमंत्री श्री नरेन्द्र मोदी द्वारा प्रतिपादित “विकास भी, विरासत भी” के विजन का उल्लेख करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि भारत का विकास और उसकी विरासत साथ-साथ चलने चाहिए। उन्होंने रेखांकित किया कि आज का भारत एक तकनीकी रूप से उन्नत, आर्थिक रूप से सुदृढ़ और वैश्विक स्तर पर प्रभावशाली राष्ट्र के रूप में आगे बढ़ रहा है, जबकि अपनी सभ्यतागत मूल्यों और लोकाचार में उसकी जड़ें आज भी उतनी ही गहरी हैं।

राजगोपुरम के उद्घाटन को आस्था के पुनर्मूल्यांकन और परंपरा की निरंतरता के रूप में वर्णित करते हुए, उपराष्ट्रपति ने कहा कि पवित्र स्थलों का पुनरुद्धार केवल वास्तुकला का विषय नहीं है, बल्कि यह हमारे सांस्कृतिक आत्मविश्वास और आध्यात्मिक जागरूकता को पुनर्स्थापित करने का माध्यम है।

इस अवसर पर कर्नाटक के राज्यपाल श्री थावरचंद गहलोत, कर्नाटक सरकार के भारी एवं मध्यम उद्योग और अवसंरचना मंत्री श्री एम. बी. पाटिल, श्री श्रीशैल जगद्गुरु डॉ. चन्ना सिद्धराम पंडिताराध्य शिवाचार्य स्वामीजी, राज्यसभा सांसद श्री ईरन्ना कडाडी, धर्मगुरु और अन्य गणमान्य व्यक्ति उपस्थित थे। इस समारोह में बड़ी संख्या में श्रद्धालु भी शामिल हुए।