समाज का काला चेहरा : यहाँ पर माँ-बाप ही लाते है बेटी के लिए 'ग्राहक'
'बेटी पढाओ, बेटी बचाओ' का नारा पिछले कुछ सालों से भारत कि गलीयारों में गुंजता नजर जा रहा है। पुरुषों कि तुलना में महिलाओं कि संख्या तेजी से घटने कि वजह से सरकार को यह कदम उठाना पड़ा। हिंदुस्थानी संस्कृती में महिलाओं कि तरफ सम्मान कि भावना से देखा जाता है। हर एक नारी में शक्ती का अस्तित्व होता है। इसी नारीशक्ती को नमन करते हुए घर कि बेटी को लक्ष्मी का दर्जा दिया जाता है। आज भी भारत के हर घर में 'प्यारी सी गुडीया' के रूप में देखा जाता है। लेकीन देश का एक समुदाय ऐसा भी है, जहाँ इसी प्यारी गुड़ीया के लिए ग्राहक ढूंढ जाते है। और यह काम खुद मां-बाप ही करते है। अंग्रेजों के जमाने से शुरू हुई इस प्रथा को बांछड़ा समुदाय आज भी निभा रहा है।
बांछड़ा समुदाय की प्रथा कि शुरुआत
मध्य प्रदेश में 'लाडली बहना' योजना काफी लोकप्रिय रही है। लेकिन इसी मध्य प्रदेश में बहन को अय्याशी का शिकार होना पड़ता है। मध्यप्रदेश के रतलाम, निमच और मंदसौर जिलें में बेटी के जिस्मफरोशी का धंदा खुलेआम किया जाता है। एक-दो नहीं बल्की 60 से अधिक गांवों में यह प्रथा आज भी देखी जाती है। यहाँ कि जवान बेटीयाँ, केवल दो सौ रूपयों के लिए आदमीयों के 'बिस्तर' सजाती है। ये यहाँ कि मजबूरी भी है और प्रथा भी। इस प्रथा को कभी किसी जमाने में अंग्रेजो द्वारा शुरू किया गया था। जो आज भी चल रही है। मध्यप्रदेश के इन तीनों जिलों में बांछड़ा समुदाय का वास्तव्य है। ब्रिटीश भारत में यहां पर अंग्रेजी सेना का डेरा हुआ करता था। सेना के जवानों कि सेवा के लिए आजूबाजू के स्थानिकों को कामपर बुलाया गया। कामों के साथ जवानों की शारीरिक सेवा के लिए इन महिलओं को कहा गया। कुछ महिलाओं ने शुरुवात में पैसों कि लालच में यह काम करना शुरु किया। धीरे-धीरे अंग्रेज अफसरों के साथ समुदाय के बडे बुजुर्गों ने बातचित कर इस प्रथा को मान्य कर लिया। आजादी के बाद अंग्रेजों का शासन ख़त्म हुआ । लेकिन इस समुदाय को स्थानिक समाज ने उसी नजरीये से देखना शुरु किया। मजबूरन बांछडा समुदाय इसी प्रथा को आगे बढ़ाते हुए अपना जीवनयापन कर रहा है।

बेटीयाँ होती है परिवार का आधार
बांछड़ा समुदाय में बेटीयों के जन्म का स्वागत बड़े धूम धाम के साथ किया जाता है। क्यों की यही बेटी बड़ी होकर परीवार के भरण-पोषण का काम करती है। बेटे का जन्म होना यहाँ अपशगुन माना जाता क्योंकि बेटा बड़ा होकर बीड़ी पीकर जीवनयापन करने के अलावा कोई काम नहीं करता। बरसों से चली आ रही इस प्रथा की वजह से इस समुदाय के पुरुषों को कोई काम भी नहीं देता। यहाँ से गुजरने वाली सड़कों पर दिन दहाडे, खुलेआम युवतीयाँ हर एक आदमी को 'चलना है क्या' ऐसा सवाल पुछकर अपने लिए 'ग्राहक' ढूंढती है। इतना ही नहीं, खुद माँ-बाप भी अपनी बेटी के लिए हर रोज ग्राहकों की खोज में होते है। 'ग्राहक' मिलने पर बेटीयाँ माँ-बाप के सामने ही बिस्तर 'सजाती' है। ये काम बांछड़ा समुदाय के परिवारों का पेट भरता है।
कुप्रथा समाज के जड़ों तक
बांछड़ा समुदाय की बेटी उम्र में आते ही उसे इस धंदे उतारा जाता है। नीमच, मंदसौर, रतलाम की ये बदनाम गलीयां बेटीयों के लिए लिए नर्क समान है। लेकिन बचपन से इसी वातावरण में पली बड़ी लडकियाँ इस धंदे को अपना नसीब समझकर जीती है। इस समुदाय में जन्म लिये युवकों की शादी ही नहीं होती। क्यों की उन्हें शादी के लिए अन्य समुदाय की लडकी नहीं मिलती। और बांछड़ा समुदाय की बेटी के साथ शादी करने के लिए उन्हें बारह से पंदरह हजार रुपीयों तक की मांग कि जाती है। क्यों की परिवार के आर्थिक कमाई का आधार लडकी ही होती है। यही मुख्य आधार गया तो फिर परिवार में कमाएगा कौन? यह सवाल होने के कारण लड़की के घरवालों को इतनी राशी देना अनिवार्य होता है। बांछड़ा समुदाय अत्यंत गरीब होने के कारण इतनी धनराशी देना किसी भी परिवार के लिए आसान हि नही बल्की अशक्य होता है। इस कारण से समुदाय के ब न जाने कितने पुरुष बिना शादी के ही रह जाते है। इस कुप्रथा को बंद करने के लिए अनेक स्वयंसेवी संस्था सामने आ रही है। साथ ही समुदाय के युवा भी इसके खिलाफ आवाज उठा रहे है। प्रशासकिय स्तरपर भी इसके लिए प्रयास किए जा रहे है। लेकिन यह कुप्रथा इस समुदाय के भितर इस तरह से घुलमिल गयी है कि लोग इससे बाहर आने के लिए तैयार हि नहीं।