हिंदी अनिवार्यता पर महाराष्ट्र सरकार पिछे हटी; कड़े विरोध के बाद निर्णय लिया पिछे
हाल ही में महाराष्ट्र सरकार द्वारा एक बड़ा निर्णय लिया गया था — राज्य के सभी स्कूलों में पहली से पाँचवीं कक्षा तक हिंदी भाषा को अनिवार्य किया जाएगा। इस निर्णय के पीछे सरकार का तर्क था कि हिंदी एक राष्ट्रभाषा है और सभी बच्चों को इसकी मूलभूत जानकारी होना आवश्यक है।
लेकिन, यह फैसला जितना जल्दी लिया गया, उतनी ही तेज़ी से इसका विरोध भी शुरू हो गया। राज्य के विभिन्न हिस्सों से, विशेष रूप से गैर-हिंदी भाषी समुदायों से, इसका तीखा विरोध देखने को मिला। अभिभावक संघ, शिक्षाविद, मराठी भाषा प्रेमी और सामाजिक संगठनों ने इसे स्थानीय भाषाओं के अधिकारों पर हमला बताया।
विरोध इतना व्यापक और तीव्र था कि सरकार को अपने फैसले पर पुनर्विचार करना पड़ा। शिक्षा मंत्री श्री दादा भुसे ने एक पत्रकार परिषद में यह स्पष्ट किया कि सरकार अब हिंदी को 'अनिवार्य' विषय नहीं बनाएगी। उन्होंने यह भी बताया कि जल्द ही एक नया शासन निर्णय जारी किया जाएगा जिसमें 'अनिवार्य' शब्द को हटाकर हिंदी को एक वैकल्पिक या अतिरिक्त भाषा के रूप में रखा जाएगा। इस घटनाक्रम ने एक बार फिर भाषा की राजनीति और भावनाओं को उजागर कर दिया है।