भारत को आजादी मिलकर 'आजादी का अमृत महोत्सव' भी मनाया गया। देश को दुनिया का सबसे ताकदवर और सबसे बड़ा लोकतांत्रिक राष्ट्र बनाने का श्रेय हमारे सर्वश्रेष्ठ संविधान को जाता है। देश की सत्ता संभालने वालों को चुनने का अधिकार जनता के हाथों मे देते समय जनता में समानता होना जरूरी था। लेकिन तत्कालीन समय की सामाजिक व्यवस्था में बड़े पैमाने पर विषमता फैली हुई थी। इस विषमता की जडे समाज की जातीगत व्यवस्था में गहराई तक जा चुकी थी। इसे पुरी तरह से खत्म करना उस वक्त संभव नही था। समाज का उपेक्षीत वर्ग मुख्य धारा में आने के लिए इन्हें आरक्षण का आधार देना वक्त की जरूरत थी। आरक्षण का आधार जाती को बनाना उस वक्त की एक तरह से मज़बूरी भी थी। क्योंकी जातीगत व्यवस्था के कारण हि पिछडा वर्ग समाज की मुख्य धारा से बाहर फेंका गया था।
देश की अंदरूनी समाज व्यवस्था में सुधार लाने का श्रेय डॉ. भीमराव आंबेडकर को जाता है। संविधान समिती में होने के कारण उन्होंने देश की शोषित, पिडीत जाती-जनजातीयों को उनका हक दिलाने के लिए काफी प्रयास किये। इन्ही प्रयासों के जरीए ही जातीयों का वर्गीकरण हुआ। SC, ST, OBC, जैसी कैटेगरी निर्माण कि गयी। देश के विभिन्न प्रांतो में अलग अलग जाती समुदाय खस्ताहाल में अपना जीवन यापन कर रहे थे। उन्हे इस आरक्षण का काफी फायदा हुआ। धीरे धीरे ये समुदाय समाज की मुख्य धारा में आने लगे। इनकी तरफ देखने का नजरीया बदलने लगा। प्रस्थापीत व्यवस्था में इनका स्थान पक्का होने लगा। उच्चभ्रू समुदाय जो कल तक इन्हें दरवाजे पर खड़ा नही करते थे, अब इनके साथ दोस्ती करने लगे थे। शोषितों का आत्मविश्वास बढ़कर उनके जीवन में प्रगती की नयी बहार आने लगी। धीरे धीरे यह सिलसिला आगे बढ़त ही चला गया।
इस आरक्षण प्रणाली मे कुछ खामियाँ जरूर थी। खुले प्रवर्ग में आने वाले कई समुदाय के लोग सभी के सभी आर्थिक संपन्न नहीं थे। लेकिन केवल जाती कि वजह से उन्हें आरक्षण का लाभ नहीं मिल पा रहा था। जातीगत आरक्षण देते समय जीन समुदायों को खुले प्रवर्ग में रखा गया, उनमें से नाजुक आर्थिक स्थिती वाले लोगों की हालत दुविधापूर्ण होने लगी। केवल जाती की वजह न उन्हें आरक्षण मिल रहा था, न स्थिती में सुधार आ रहा था, ना प्रस्थापीतों में गिनती हो रही थी। ऐसें स्थिती में इन समुदायों की आरक्षण के बारे में भावनाएं तिव्र होना स्वाभाविक था। जाट, गुर्जर, पाटीदार, मराठा जैसे समुदाय सालों से सत्ता में रहने के बावजूद भी उनमे से ही एक आर्थिक पिछडा वर्ग सिस्टम से जुझता रहा। अपनी प्रगती के लिए राह ढूंढता रहा। शिक्षा के माध्यम से प्रगती होती है, इस मानसिकता के कारण उनके अंदर आक्षरण की मांग पनपती गयी। और विभिन्न प्रदेशों में ऐसे बडे बडे समुदाय आरक्षण की मांग करने लगे।
वर्तमान स्थिति में समाज में उत्पन्न हुई ऐसी विचित्र विषमता को दूर करना हो तो ऐसे समुदायों को उनकी जनसंख्या के प्रतिशत पर आरक्षण देना होगा; जो की सर्वोच्च न्यायालय के आरक्षण नियमों के विपरीत है। इसके लिए संविधान में संशोधन जरूरी है। अगर आरक्षण देना शक्य नहीं तो जाती आधारीत आरक्षण पुरी तरह से खत्म करना होगा, जो अभी के हालातों में लगभग अशक्य नजर आ रहा है। इस स्थिती से निपटने के लिए केन्द्रीय स्तर पर ठोस कदम उठाने की जरूरत है, वरना आरक्षण आंदोलन की स्थिती बार बार तैयार होती रहेगी।