तमिलनाडु सरकार और राज्यपाल के बीच के टकराव का मामला पिछले हप्ते सर्वोच्च न्यायालय ने सुलझाया। अपने ऐतिहासिक फैसले में न्यायालय ने राज्यपाल को फटकार लगाते हुए दस विधेयक बिना अनुमती के पारित भी कराए। साथ ही आनेवाले समय में राज्य सरकार द्वारा लिए गये निर्णयों पर मुहर लगाने की समय सीमा भी तय कर दी। यह समय सीमा राज्यपाल के साथ राष्ट्रपती के लिए भी न्यायालय ने निर्धारित की है। देश के सर्वोच्च न्यायालय का यह ऐतिहासिक निर्णय निश्चित ही सराहनीय है। साथ ही यहाँ की राजनितिक व्यवस्था के लिए एक बड़ा सबक भी है। दिन-ब-दिन दिशाहीन और तर्कहीन बनती जा रही देश की राजनिती को अपने कर्तव्यों का एहसास दिलाने के लिए न्यायालय को इस तरह के फैसले लेने के लिए मैदान में उतरना यहाँ की राजनितिक व्यवस्था की हार है।
राज्यपाल पद का अवमूल्यन
राज्यपाल का पद राज्य का संवैधानिक प्रमुख होता है। केंद्र और राज्य सरकार को जोडनेवाला एक महत्त्वपूर्ण घटक होता है। लेकीन राज्यपाल की नियुक्ती महामहिम राष्ट्रपति द्ववारा होती है। जिसकी शिफारिश केंद्र सरकार द्वारा कि जाती है। राज्यपाल की नियुक्ती केंद्र सरकार द्वारा होने के कारण राज्यपाल का पद एक तरह से केंद्र के प्रतिनिधी के रूप में बनकर रह जाता है। केंद्र में जीस पार्टी की सत्ता, उसी पार्टी के किसी नेता को इस पद बिठाया जाता है। इस कारण से राजनीतिक विचारधारा को आगे बढ़ाने के लिए और केंद्र सरकार की विरोधी पार्टियों की सरकारों पर नियंत्रण पाने के लिए इस पद का उपयोग पिछले कुछ वर्षों में होता नजर आ रहा है। ऐसा करना राजनितिक फायदों के लिए भले ही सही दिख रहा हो, लेकीन संविधानिक दृष्टी से लोकतंत्र के लिए खतरा साबीत हो रहा है। पिछले कुछ नजदिकी वर्षों में ऐसा चित्र कई राज्यों में नजर आ रहा है। जिन राज्यों में भाजपा की सरकार नहीं है, वहां पर केंद्र सरकार द्वारा भेजे गये राज्यपाल कई बार राज्य सरकार द्वारा लिए गये निर्णयों को अनुमती देने के लिए जानबूझकर विलंब करते नजर आए है। महाराष्ट्र में महाविकास अघाडी कि सरकार के समय ऐसे मामले पुरे जोर शोर से उजागर होते गये। दक्षिण भारत में सभी राज्यों में वहाँ की स्थानीय पार्टीयों की सरकारे है। और ज्यादातर केंद्र सरकार की विचारधारा से विपरीत है। ऐसे में वहाँ की सरकारों पर नियंत्रण रखने के लिए केंद्र सरकार राज्यपाल को मुहर बनाकर उपयोग में लाती नजर आयी है। राज्यपाल जैसे महत्त्वपूर्ण पद का इस्तेमाल इस तरह की राजनिती के लिए करना निश्चित ही उचीत नहीं है। तमिलनाडु के बहाने ही सही, सर्वोच्च न्यायालय ने इस तरह गतिविधीयों पार सही मायनों में रोक लगाई है।
राजनितिक व्यवस्था को कोर्ट की फटकार
इस निर्णय के बहाने सर्वोच्च न्यायालय ने देश की राजनितिक व्यवस्था को फटकारा है। पार्टी और राजनितिक फायदों के लिए ऐसे महत्त्वपूर्ण पदों का इस्तेमाल अब इसके बाद राजनेता नहीं कर पाएंगे। सर्वोच्च न्यायालय का हर एक निर्णय कानून के समान होने के कारण सभी राजनितिक दलों को अब इसका पालन करना होगा। राज्य सरकारों को निर्णय लेने के लिए अब महामाहीम, राज्यपाल कि मनमानी का सामना नहीं करना पडेगा। जनता द्वारा चुनी हुई सरकारें अब सही मायनों में राष्ट्रपति द्वारा नियुक्त राज्यपाल की अनुमती के लिए सालों तक राह नही देखेगी। लोकतंत्र में जनता का निर्णय सर्वोच्च होता है। जनता ने चुनी हुई सरकारे कई बार राजनितिक मतभेदों के चलते गणतांत्रिक बहुमत के बावजूद केवल एक व्यक्ती के राजनितिक स्वार्थ के कारण निर्णय नहीं ले पाती थी। या तो उन निर्णयों को कानून में नहीं बदल पाती थी। न्यायालय ने ऐसी दुविधा को सुलझा दिया है। साथ ही केंद्र द्वारा राज्य सरकारों पर अलिखित नियंत्रण को भी खत्म कर दिया है। लोकतांत्रिक देश की व्यवस्था लोकतांत्रिक तरिके से ही अपनानी होगी, ऐसा भी महत्त्वपूर्ण सुझाव और समझ इस निर्णय के पिछे जुडी हुई है। इस निर्णय का स्वागत करते हुए आने वाले समय में सभी राजनितिक दल राज्यपाल पद की गरीमा बनाए रखेंगे ऐसी अपेक्षा करते है।