हिंदी बनाम प्रादेशिक भाषा : सांस्कृतिक संघर्ष का नया अध्याय
भारत के संविधान में किसी भी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा नहीं दिया गया है। हालाकी हिंदी और अंग्रेजी को राजभाषा का दर्जा प्राप्त है। आजादी के पहले से लेकर दक्षिण भारत के लोग हिंदी को अपनाना नहीं चाहते। पिछले महिने तमिलनाडु के मुख्यमंत्री स्टालीन ने हिंदी का कड़ा विरोध करते हुए हिंदी को तमिल जनता पर थोपने का आरोप लगाया। भाषा के विवाद के चलते उन्होंने स्वायत्तता की भी मांग की। अभी महाराष्ट्र सरकार ने स्कूली पाठ्यक्रम में हिंदी को अनिवार्य भाषा के रूप में लेने का निर्णय लिया है। इस निर्णय का कड़ा विरोध करते हुए महाराष्ट्र नवनिर्माण सेना के अध्यक्ष राज ठाकरे ने तीखे तेवर अपनाए है। इस निर्णय को वापस लेने का अनुरोध का करते हुए करते हुए कहा की, हम किसी भी हालात में हिंदी को अनिवार्य भाषा के रूप में स्वीकार नहीं करेंगे। भारत में सबसे ज्यादा बोली जानेवाली भाषा होने के बावजूद भी हिंदी के बारे में ऐसे विवाद बार बार क्यों सामने आते है..?
राष्ट्रभाषा, राजभाषा और राज्यभाषा
राष्ट्रभाषा किसी भी देश की अधिकृत संविधानिक भाषा होती है, जो सभी नागरिकों के लिए लागू होती है। भारतीय संविधान के अनुच्छेद 343 के अनुसार देश की कोई भी राष्ट्रभाषा नहीं है। किसी भाषा को राष्ट्रभाषा का दर्जा न होने के कारण कोई भी भाषा का बंधन या अनिवार्यता नागरिकों पर लागू नहीं हो सकती। हिंदी और अंग्रेजी को राजभाषा की मान्यता होने की कारण इन दो भाषाओं को सरकारी कामकाजों में उपयोग में ला सकते है। देश के नागरिकों की शिक्षा किस भाषा में होनी चाहिए इसके लिए कोई भी कानूनी प्रावधान नहीं है। इसलिए, शिक्षा क्षेत्र में किसी भाषा की अनिवार्यता लागू नहीं हो सकती। लेकीन हर राज्य की अपनी अपनी एक राज्यभाषा होने के कारण राज्य सरकार अपने राज्य की राज्यभाषा को शिक्षा व्यवस्था में अनिवार्य कर सकते है। भारतीय संविधान में 22 भाषाओं को आधिकारिक भाषा को मान्यता दी गयी है। राज्यों की राज्यभाषा इन्हीं 22 भाषाओं में होने के कारण राज्यभाषाओं को संविधानीक मान्यता है।
भाषाओं का सांस्कृतिक संघर्ष
दक्षिण के लोग अपनी भाषीय अस्मिता को लेकर कुछ ज्यादा ही संवेदनशील है। अपनी मातृभाषा के साथ वे कभी भी समझौता नहीं करते। स्वायत्तता की मांग करनेवाले तमिलनाडु में केवल एक प्रतिशत लोग हिंदी बोल सकते है। केरल, आंध्रप्रदेश, कर्नाटक और तेलंगना में भी अपनी मातृभाषा को लेकर काफी संवेदनशीलता देखी जाती है। उत्तर भारत में ज्यादातर हिस्सों में हिंदी बोली जाती है। उत्तर प्रदेश, उत्तराखंड, बिहार, झारखंड, मध्यप्रदेश, छत्तीसगढ़, दिल्ली, हरियाणा, हिमाचल प्रदेश, राजस्थान, आदी राज्यों की राज्यभाषा हिंदी होने के कारण इन राज्यों को हिंदी बेल्ट कहा जाता है। पश्चिमी भारत में गुजरात और महाराष्ट्र, पूर्व भारत में ओडीशा और प. बंगाल जैसे राज्य न उत्तर में आते है, ना दक्षिण में। इन सभी राज्यों की अपनी अपनी राज्यभाषाएं है। इन चारों राज्यों को अपनी भाषीय अस्मिता होने के बावजूद दक्षिण भारत की भाषीय कट्टरता पायी नहीं जाती। पूर्वोत्तर राज्यों में भाषिक विविधता के साथ भौगोलिक विविधता भी है। लेकीन छोटे छोटे भाषीय समुदाय होने के कारण इनका प्रभाव राष्ट्रीय स्तर पर नजरअंदाज किया जाता है। दक्षिण भारत में उत्तर भारत के राजनितिक प्रभाव को लेकर असुरक्षितता का माहौल बना रहता है। इसी के चलते खुद के अस्तित्व को उजागर करने के लिए और उत्तर भारत का प्रभाव न मानने के लिए यहाँ पर शुरु से ही हिंदी का विरोध होता आया है। राज्य पुनर्गठन आयोग के अनुसार भाषावार प्रांतरचना को मान्यता दी गयी थी। राज्य की निर्मिती का मुख्य आधार भाषा होने के कारण स्थानिय भाषा को महत्त्व प्राप्त हुआ; और यही अस्मिता का प्रतिक भी बन गया। दिन ब दिन इसमें इजाफा होता नजर जा रहा है। भाषावार प्रांतरचना को संविधानिक महत्त्व प्राप्त है तो किसी और भाषा की अनिवार्यता क्यों...? मातृभाषा और राज्य भाषा को अहमीयत क्यों नहीं...? अगर स्थानिय लोग स्थानिय भाषा को अस्मिता का प्रतिक मानकर उसे अहमियत देते है तो उस में गलत क्या...? लेकिन ऐसे ही भाषीय अस्मिता को लेकर चलते रहेंगे तो देश को एक सूत्र में बांधनेवाली भाषा कौन सी...? हिंदी को छोडकर अंग्रेजी अपनाना वास्तविकता के विरुद्ध होगा। क्यों की हिंदी फिल्मों के प्रभाव से देश का आम आदमी हिंदी बोल सकता है। हिंदी बोलने-समझने वालों की संख्या जादा होने के कारण इसे व्यवहार में रख सकते हैं। जहां की राज्यभाषा हिंदी नहीं, वहां की शिक्षा व्यवस्था में हिंदी को अनिवार्य भाषा की मान्यता किस हद तक सही होगा? इस पर विचार होना जरूरी है। लोकतांत्रिक देश में भाषा के आधार पर सांस्कृतिक आक्रमण करना मतलब संघर्ष को न्यौता देने जैसा है, ऐसा हम निश्चित तौर पर कह सकते हैं।