जी हां... आतंकियों का भी धर्म होता है।

 

ये बात कड़वी है, लेकिन सच्ची है। पहलगाम हमले में जो हुआ, वो सिर्फ एक हमला नहीं था—वो इंसानियत के खिलाफ एक साजिश थी। निहत्थे, बेगुनाह लोगों पर गोलियां चलाई गईं। लेकिन वो गोलियां यूं ही नहीं चलीं... वो किसी की पहचान पूछकर चलीं। किसी की आस्था देखकर चलीं। किसी का धर्म जानकर चलीं।

हम बचपन से सुनते आए हैं—"सब धर्म एक समान हैं।" "हिंदू, मुस्लिम, सिख, ईसाई—हम सब भाई-भाई।" तो फिर... उस दिन, उस वादी में ये भाईचारा कहाँ था? उस दिन धर्म के नाम पर मौत क्यों बाँटी गई? क्या सिर्फ इसलिए कि वे लोग किसी और मज़हब से थे? क्या इसलिए कि वे मुसलमान नहीं थे? क्या इसीलिए उन्हें निशाना बनाया गया? और सबसे बड़ी हैरानी की बात— जब हम ये सवाल पूछते हैं, तो कुछ लोग कहते हैं, "आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता।" वाह भाई! क्या बात है!

अगर आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता, तो फिर पहलगाम में गोलियों ने धर्म क्यों पहचाना? अगर आतंकवाद का कोई मज़हब नहीं होता, तो फिर मारे जाने वालों में गैर-मुस्लिम को ही क्यों चुना गया? हमें ये समझना होगा— आतंकवाद का धर्म नहीं बताना, उसकी सच्चाई से मुँह मोड़ना है। आतंकवादियों की एक सोच होती है, एक एजेंडा होता है, और अक्सर वो एजेंडा धर्म के लिबास में छिपाया जाता है। ये लोग धर्म की आड़ लेकर खून बहाते हैं, ज़हर फैलाते हैं, और फिर हमसे उम्मीद करते हैं कि हम चुप रहें... सेक्युलर रहें... सिर्फ पीड़ित बनकर रह जाएं।

लेकिन अब वक्त आ गया है सच बोलने का। अब हमें ये स्वीकारना होगा कि आतंकवाद को पैदा करने वाला ज़हर कई बार मज़हबी सोच से उपजता है। जो मज़हब इंसान को इंसान न समझे, जो विचारधारा गैर को काफिर माने और काफिर की जान लेना जिहाद माने—उस पर सवाल उठाना जरूरी है। और हां, हम अभी भी यही कहते हैं—हिंदू मुस्लिम भाई-भाई, लेकिन भाईचारे की असली परीक्षा तब होती है जब कोई एक धर्म के नाम पर खून बहाता है, और दूसरा धर्म फिर भी शांति की बात करता है। 'मजहब नहीं सिखाता आपस में बैर रखना..' ऐसा देशभक्ति पर लिखने वाला कवी भी जब पुरखों की जमीन छोड़कर धर्म के नाम पर अपना वतन चुनता है, तब हमें हमारे खोखले भाईचारे का मतलब समझ में आता है। हर रोज हमारे साथ काम करनेवाला दोस्त जब मंदिर का प्रसाद ग्रहण करने से मना करता है, सिर्फ इसलिए कि किसी और मजहब का है, तब हमें हमारे खोखले भाईचारे का मतलब समझ में आता है। क्यों भाई... भाईचारे का ठेका सिर्फ हिंदुओं ने लेकर रखा है...?

आज हमें आतंकवाद के उस चेहरे को बेनकाब करना है, जो धर्म की आड़ में छिपा है। हमें वो झूठी सेक्युलरिज़्म की परतें हटानी होंगी, जो हर बार कहती हैं—"आतंकवाद का कोई धर्म नहीं होता..." क्योंकि सच्चाई ये है— आतंकवादियों को धर्म होता है, और वो उसी धर्म के नाम पर बंदूक चलाते हैं। आतंकियों की गोलियों का निशाना हर बार हिंदू ही क्यों होता है...? आतंकी हमलें में हर बार हिंदू ही क्यों मरता है..? सेक्युलरिज्म कि बात करनेवालों को पहलगाम में हुआ हमला एक तमाचा है, जो सेक्युलरिज्म कि पिपुडी बजाना बंद करने के लिए कह रहा है। बेशक, हिंदू धर्मनिरपेक्ष है। लेकिन धर्म पुछकर गोलीयां बरसाने वालों पर सेक्युलरिज्म का पडदा हटाकर वो शस्त्र लेकर दौड़ भी सकता है। कट्टर हिन्दू बनकर भगवाधारी भी बन सकता है।

सच्चाई यही है कि आतंकियों का धर्म होता है। ये धर्म सिर्फ हिंसा जानता है। गैर-मुस्लिमों की जान लेना जानता है। गोलियों की दहशत से आशियाना उखाड़ना जानता है। हमें सच्चाई माननी होगी की 'आतंकियों का धर्म होता है।' हम इस सच्चाई से भाग नहीं सकते। और जब तक हम भागते रहेंगे, तब तक न पहलगाम रुकेगा, न पुलवामा, न दिल्ली, न मुंबई... अब वक्त है आँखों में आँखें डालकर सच कहने का।
'जी हां... आतंकवाद का धर्म होता है।' और जब तक हम इसे पहचानेंगे नहीं, तब तक हम इससे लड़ नहीं पाएंगे।